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एक सुखद यात्रा पूर्णिया से बैंगलोर तक की...!!

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बात उन दिनों की है   जब हम छुट्टियों में अपने घर पूर्णिया आये हुए थे , छुट्टियां ख़त्म हुई और  हम घर से वापस बैंगलोर को आ रहे थे .. मार्च का महीना था .. थोड़ी गर्मी पड़ने को थी , पसीने में लथ - पथ थे .. गाडी अपने समय से पहले स्टेशन पहुंच चुकी थी .. हम अपने पापा के साथ थे जो हमें   छोड़ने को स्टेशन तक आये हुए थे,,.कुछ देर पापा हमारे साथ हमारी बगल वाली सीट पर बैठे , फिर गाडी ने हॉर्न (सिटी ) दी ..उसके बाद मैंने पापा को प्रणाम किया और उनसे इज़ाज़त मांगी की जल्द ही फिर वापस आऊंगा इस बार और थोड़े दिन हाथ में रखूँगा इतने में एक लड़की यही कोई २३ - २४ साल उमर रही होगी हांफती हुई .. अपने दुप्पटे से चेहरे को पोछती हुई   हमारे कोच के दरवाजे के पास खड़ी थी   शायद  उसे भी उसी ट्रैन से   सफर करना था .. पर वो सामान लेकर दरवाजे पे क्यों खड़ी थी ये मेरी समझ से परे था ..कुछ देर रुक कर जो मन के अंदर सवाल उठ रहे थे हमने आखिर पूछ ही लिया  आप यहाँ क्यों खड़े हो? कुछ देर में गाडी रवाना हो जाएगी जल्दी से ऊपर आ...