Wednesday, 25 February 2026

पुस्तक समीक्षा: मुसाफ़िर कैफ़े - दिव्य प्रकाश दुबे

‘अक्टूबर जंक्शन’ पढ़ने के बाद दिव्य प्रकाश दुबे जी की लेखनी ने मन पर जो असर छोड़ा था, उसी ने मुझे उनकी अगली चर्चित कृति मुसाफिर कैफ़े तक पहुँचा दिया। ऊपर से आने वाली सीरीज़ में विक्रांत मेसी जैसे सुलझे हुए कलाकार का नाम जुड़ जाए, तो उत्सुकता और भी बढ़ जाती है। सोचा, क्यों न पहले किताब को ही अपने तरीके से महसूस किया जाए — क्योंकि समीक्षा आखिरकार निजी होती है। जो मैंने देखा-समझा, जरूरी नहीं आप भी वैसा ही देखें… पर शायद कुछ एहसास मिल जाएँ।

कहानी आखिर है क्या?

‘मुसाफिर कैफ़े’ सपनों, प्रेम और उन अधूरे ख्वाबों की कहानी है जो हमारी “लिस्ट” में तो होते हैं, पर ज़िंदगी उन्हें अपनी शर्तों पर पूरा करती है।

मुख्यतः यह कहानी है सुधा और चंदर की — दो बिल्कुल अलग स्वभाव के लोगों की।

एक मुलाकात… एक कैफ़े… और दो जिंदगियाँ जो अनजाने में एक-दूसरे की ओर बढ़ने लगती हैं।

सुधा, जो पेशे से तलाक वकील है, शादी पर विश्वास नहीं करती। उसने रिश्तों को टूटते देखा है, इसलिए वह बंधन से डरती है।

चंदर, एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, सीधा-सादा और समझदार — जो उसकी सोच को सुनता भी है और समझता भी।

धीरे-धीरे बातों से साथ, और साथ से अपनापन जन्म लेता है।

वे साथ रहने लगते हैं… प्यार भी होने लगता है…

पर प्रेम हमेशा सीधा रास्ता नहीं चुनता।

ज़िद, सपने और अपनी-अपनी सोच — इन सबके बीच उनके रास्ते अलग हो जाते हैं।

और फिर वही प्रश्न ? —

क्या दो लोग जो एक-दूसरे को सबसे बेहतर समझते हैं, सच में अलग रह सकते हैं?

या जिंदगी उन्हें फिर किसी मोड़ पर मिलाती है?

किताब पढ़ते हुए कई जगह मुझे गुनाहों का देवता की याद आई। कहानी अलग है, पर रिश्तों की गहराई और अनकहे भावों का असर कहीं-कहीं वैसा ही लगता है।

दिव्य प्रकाश जी की खासियत उनकी सहज भाषा है — बोलचाल की, हल्की-फुल्की, मगर भीतर से गहरी।

वे भारी शब्दों का सहारा नहीं लेते, बल्कि साधारण पंक्तियों में असाधारण बातें कह जाते हैं —

“लाइफ को लेके प्लान बड़े नहीं, सिंपल होने चाहिए…”

“सबसे ज्यादा वो यादें याद आती हैं जो हम बना सकते थे…”

कहानी सिर्फ प्रेम नहीं कहती, यह हमें यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि —

क्या हम अपने सपनों के लिए जीते हैं, या सपने हमारे लिए?

क्या हर रिश्ता नाम का मोहताज होता है?

हाँ, कहीं-कहीं लगा कि भाषा थोड़ी और गहरी होती तो कुछ भाव और गहरे उतरते।

लेकिन फिर यही सादगी शायद इस कहानी की असली ताकत भी है।

कहानी का अंत अप्रत्याशित है — और यही उसे यादगार बनाता है।

सुधा और चंदर कहीं न कहीं हमारे भीतर ही बस जाते हैं — हमारे अधूरे फैसलों में, हमारी टलती हुई हिम्मत में, और उन सपनों में जिन्हें हम कल पर छोड़ देते हैं।

शायद इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात यही है कि यह हमें अपने दिल की “लिस्ट” याद दिलाती है — वो लोग, वो ख्वाब, वो बातें जिन्हें हम जी तो सकते थे, पर जी नहीं पाए।

और फिर मन ही मन एक सवाल छोड़ जाती है —

क्या अभी भी देर हुई है, या हम अपने हिस्से का सफर शुरू कर सकते हैं? 💛

शब्दों के इस सफ़र में,
मैं कुछ एहसास छोड़ जाता हूँ…
अगर वे आपके दिल तक पहुँचे,
तो समझिए कहानी मुकम्मल हुई।

– आनंद 
(दिल, किताब और रास्तों का मुसाफ़िर) 

Saturday, 7 February 2026

अक्टूबर जंक्शन - दिव्य प्रकाश दुबे

मैं एक इंजीनियरिंग का छात्र रहा हूँ, लेकिन साहित्य से मेरा रिश्ता बहुत पुराना और आत्मीय रहा है। जब भी ज़िंदगी की भागदौड़ में खुद से दूर होता जाता हूँ ,तो मैं इस पुराने दोस्त—किताबों—को गले लगा लेता हूँ।

जब मन बोझिल हो, जब समझ न आए कि क्या करूँ, तब एक अच्छी किताब मेरे लिए सहारा बन जाती है। शब्दों के साथ बिताया गया वह समय सिर्फ़ मन बहलाता ही नहीं, बल्कि भीतर कहीं गहराई में ठहराव भी पैदा करता है। साहित्य से दोस्ती करने का यही तो जादू है—यह आपको रुकना सिखाता है, साँस लेने की मोहलत देता है, और उस शांति से मिलवाता है जिसे हम अक्सर इस तेज़ रफ़्तार दुनिया में नज़रअंदाज़ करते चले जाते हैं।

इसी प्रेम और अपनापन के साथ मैं अक्टूबर जंक्शन को पढ़ने बैठा, और शायद यही वजह है कि यह कहानी मुझे सिर्फ़ पढ़ी हुई नहीं लगी, बल्कि महसूस की हुई लगी…

"अक्टूबर जंक्शन " चित्रा पाठक और सुदीप यादव की एक बेहद ख़ूबसूरत कहानी है। दोनों की पहली मुलाक़ात 10 अक्टूबर को बनारस के एक छोटे-से कैफ़े में होती है—जहाँ किताबों की खुशबू और बातों की गर्माहट धीरे-धीरे दो अनजानी ज़िंदगियों को जोड़ देती है। पढ़ने का शौक दोनों की पहली डोर बनता है, जो कब एक गहरे रिश्ते की शक्ल ले लेता है, पता ही नहीं चलता।

सुदीप एक सफल और प्रतिष्ठित व्यवसायी हैं, वहीं चित्रा अपने शब्दों के सहारे अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही एक जुझारू लेखिका। बिल्कुल अलग-अलग दुनिया से आए ये दो लोग, उस एक मुलाक़ात के बाद एक साझा सफ़र पर निकल पड़ते हैं—भावनाओं, सवालों और अनकहे एहसासों से भरा हुआ।

उनकी यह पहली भेंट कैसे एक मोड़ बन जाती है, और कैसे वही मोड़ आगे चलकर ‘अक्टूबर जंक्शन’ का रूप ले लेता है—इसे लेखक ने किताब में इतनी नर्मियत और खूबसूरती से पिरोया है कि कहानी पढ़ते हुए आप खुद भी उस सफ़र का हिस्सा बन जाते हैं।

जब अक्टूबर जंक्शन के शुरुआती पन्ने पलटे, तो कहानी ने बिना शोर किए मुझे अपने भीतर खींच लिया। ऐसा महसूस हुआ मानो किसी भूले-बिसरे रेलवे प्लेटफॉर्म पर अकेला खड़ा हूँ—जहाँ शब्दों से पहले एहसास आते हैं, और कहानी की पदचाप दूर से ही सुनाई देने लगती है।

दिव्य प्रकाश दुबे की लेखनी की खूबसूरती यही है कि वह आम ज़िंदगी के छोटे-छोटे लम्हों में छुपी भावनाओं को बेहद ईमानदारी और नर्मियत से उकेरते हैं। इस उपन्यास में भी वही सहजता है—जो ज़ोर से नहीं, बल्कि बहुत धीमे से दिल को छूती है और देर तक अपने साथ ठहरने पर मजबूर कर देती है।

वे न तो दोस्त हैं, न प्रेमी, न विवाहित, लेकिन उनके बीच एक ऐसा विशेष बंधन है जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।

बनारस का परिवेश भी उपन्यास का एक महत्वपूर्ण पात्र है। शहर का वर्णन इतने सजीव ढंग से किया गया है कि वह पन्नों पर जीवंत हो उठता है। आप लगभग हवा में मसालों की सुगंध महसूस कर सकते हैं और नदी के बहने की ध्वनि सुन सकते हैं।

इस उपन्यास में दूरी और समय की भूमिका भी बहुत खास है। कभी कभी कुछ मुलाकातें हमारे जीवन को दिशा दे देती हैं, भले ही वे कम हों। कहानी यह एहसास कराती है कि रिश्तों का अर्थ सिर्फ साथ रहने में नहीं है, बल्कि उन पलों में भी है जो सही समय पर हमें मिल जाते हैं। दूरी यहां सिर्फ भौगोलिक नहीं है, यह मानसिक और भावनात्मक भी है।



कुल मिलाकर अक्टूबर जंक्शन एक बेहद संवेदनशील और मन को ठहरकर सोचने पर मजबूर कर देने वाला उपन्यास है। यह सिर्फ प्रेम और बिछड़ने की कथा नहीं, बल्कि ज़िंदगी के मायनों को समझने की एक नर्म, गहरी यात्रा है—जहाँ हर मोड़ पर कोई न कोई एहसास चुपचाप दिल से बात करता है।

मैं इसे पूरे मन से उन सभी पाठकों को पढ़ने की सलाह दूँगा, जो कहानियों में सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सोचने का सुकून, भावनाओं की सच्चाई और शब्दों के बीच छुपी गहराई ढूँढते हैं।

                             

हाँ, यह सच है कि कहानी का अंत मुझे व्यक्तिगत तौर पर पूरी तरह रास नहीं आया—लेकिन शायद यही इसकी सबसे बड़ी सच्चाई भी है। आखिर ज़िंदगी में भी तो हर मोड़ हमारी पसंद का नहीं होता। हम चाहें या न चाहें, कुछ बातें बस घटती चली जाती हैं… उन पर हमारा ज़ोर कहाँ चलता है। खैर यह तो मज़ाक था।

असल में यह कहानी बनारस के घाटों की शांत साँझ से जन्म लेती है, मुंबई की चमक-दमक भरी होटलों से होकर गुज़रती है और अंततः लखनऊ के एक सूने से घर में आकर ठहर जाती है। इस पूरे सफ़र में यह न जाने कितनी बार दिल को छूती है, और कब आपकी पलकों के कोने नम कर देती है—पता ही नहीं चलता।

एक बेहद खूबसूरत, भावनाओं से भरी हुई कहानी है। दिल से कहूँ तो आप सबको इसे ज़रूर पढ़ना चाहिए। 💛

Tuesday, 1 April 2025

गुनाहों का देवता - धर्मवीर भारती

इंजीनियरिंग का छात्र होने के वाबजूद हमें साहित्य से बहुत लगाव है, कई वर्षों के बाद फिर से किताब उठाई है , अपने इस साहित्यिक दोस्त से फिर से दोस्ती कर ली है हमने , कहते है जब आप साहित्य पढ़ते है तो "आप" आप नहीं रह जाते , हर किसी को अपने जीवन में साहित्य को शामिल जरूर करना चाहिए। 

इस बार जो किताब हमने शुरू करी वो थी धर्मवीर भारती जी की " गुनाहों का देवता " ये धर्मवीर जी की कालजयी रचना है , ओह मुझे नहीं पता इसे मैने खत्म किया ये किताब ने मुझे खत्म, पद्मश्री से सम्मानित धर्मवीर जी ने ये किताब महज २३ साल की उम्र में लिखा था ,लेखकों ने कहा कमजोर कृति है और आज सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले उपन्यासों में एक है ये , प्यार ,समर्पण, त्याग का अनूठा उदाहरण चन्दर और सुधा की कहानी ।

कहानी के चार मुख्य किरदार हैं. हीरो चन्दर, प्रेमिका सुधा, और चंदर की दो और दीवानी बिनती और पम्मी. गुनाहों का देवता की पूरी कहानी इन्हीं किरदारों के इर्दगिर्द घूमती है. चन्दर यानी इस प्रेम कहानी का हीरो सुधा के प्रोफेसर पिता के प्रिय छात्रों में से एक है 

कहानी काफी साधारण हैं । चन्दर एक गरीब परिवार से हैं और डॉ. शुक्ला उसे अपना लेते हैं। शुक्ला जी की लड़की हैं सुधा। चन्दर का शुक्ला जी के घर बे रोक टोक आना जाना रहता हैं। सुधा और उसके बीच काफी हसी ढिंढोली चलती रहती हैं। चन्दर अपनी रिसर्च मैं व्यस्त रहता हैं और बीच बीच मै डॉ. शुक्ला के संग उनके कार्यक्रम मैं जाता हैं। शुक्ला जी ने चन्दर का करियर बनाने का जिम्मा अपने सिर पर ले लिया था और उसका मार्ग दरशन करते रहते थे। सुधा शादी से हमेशा इंकार करती है क्यूंकि उसे चन्दर से प्यार हैं लेकिन चन्दर जिस आदमी के आश्रय तले पढ़ा, उसको कैसे धोखा देता 

जो चन्दर सुधा को मन ही मन इतना चाहता था, वही किसी दुसरे से उसका रिश्ता तय करवाने चला।

सुधा की शादी संपन्न हो जाती है लेकिन सुख कभी नहीं आता।

चंदर, सुधा से प्रेम करता है, लेकिन सुधा के पिता के उस पर किए गए एहसान और उसके आदर्शों के कारण वह अपने मन की बात सुधा से नहीं कह पाता. , चंदर, सुधा के लिए अपने प्रेम को दबाकर रखता है और अपने आदर्शों को महत्व देता है, जो उसे "गुनाहों का देवता" बनाता है. 

गुनाहों का देवता का अर्थ मेरी नजर में -अपने आत्मसम्मान की चिंता वो लोग कतई नहीं करते जो सदैव ये चाहते है मुझसे किसी को ठेस न पहुंचे और दूसरों का कल्याण होता रहे ।

सभी अच्छी कहानियो का अंत प्रायः दुखद ही होता है और जब कहानी प्रेम पे आधारित हो तो दुखद अंत तो और आवश्यक हो जाता है। गुनाहो का देवता मै भी कुछ ऐसा ही हैं। अब जिंदगी मै कभी कभार ही प्रेम प्रसंग अपने मुकाम मै पहुंच पाते हैं, ज्यादातर विफल हो जाते हैं और विफलता के प्रसंग ही पढ़ने लायक, बांटने लायक होते है। जब सब कुछ अच्छा हो जाये तो फिर पढ़ने मैं काहे का आनंद? शायद इसी दुविधावश लेखक को इस कहानी को दुखद अंत देना पड़ा।

भले ही कहानी मैं उन सब बातो का जिक्र है जो साधारणतया हम हिंदी साहित्य मैं पाते नहीं, लेकिन उस समय के समाज का आयना हैं गुनाहो का देवता।

कहानी का अंत मन को काफी झुंझला देता हैं। हम पढ़ना चाहते हैं उन रचनाओं को जिनका अंत आशा के विपरीत हो, चाहते हैं की लेखक हमे चकित करें लेकिन मन में फिर भी कहीं एक आशा की आशा की किरण होती हैं की शायद अंत अच्छा हो। खैर, अंत कैसा भी क्यों न हो, सबको पसंद आ नहीं सकता लेकिन इस कहानी का अंत कुछ ज्यादा ही दुखद हैं।

गुनाहों के देवता की कुछ ऐसी पंक्तियां जो सोचने पर मजबूर करती है कुछ तो ऐसी है जो अंदर तक झकझोड़ देती है..


" या तो प्यार आदमी को बादलों की ऊँचाई तक उठा ले जाता है , या स्वर्ग से पाताल में फेंक देता है।लेकिन कुछ प्राणी हैं, जो न स्वर्ग के हैं न नरक के, वे दोनों लोकों के बीच में अंधकार की परतों में भटकते रहते हैं। वे किसी को प्यार नहीं करते, छायाओं को पकड़ने का प्रयास करते हैं, या शायद प्यार करते हैं या निरंतर नयी अनुभूतियों के पीछे दीवाने रहते हैं और प्यार बिलकुल करते ही नहीं। "

"हरेक आदमी जिंदगी से समझौता कर लेता है किन्तु मैंने जिंदगी से समर्पण कराकर उसके हथियार रख लिए हैं "

“विश्वास करो मुझ पर सुधा, जीवन में अलगाव, दूरी, दुख और पीड़ा आदमी को महान बना सकती है। भावुकता और सुख हमें ऊँचे नहीं उठाते।”

"क्या पुरुष और नारी के सम्बन्ध का एक ही रास्ता है -प्रणय, विवाह और तृप्ति ! पवित्रता, त्याग और दूरी क्या सम्बन्धों को, विश्वासों को जिन्दा नहीं रहने दे सकते?"

आओ चन्दर "आज अपने हाथ से खिला दूं, कल ये हाथ पराये हो जाएंगे”

“लेकिन आदमी हँसता है, दुख-दर्द सभी में आदमी हँसता हैं। जैसे हँसते-हँसते आदमी की प्रसन्नाता थक जाती है वैसे ही कभी-कभी रोते-रोते आदमी की उदासी थक जाती है और आदमी करवट बदलता है। ताकि हँसी की छाँह में कुछ विश्राम कर फिर वह आँशुओं की कड़ी धूप में चल सके।”

उपन्यास की आखिरी लाइनें हैं... "सितारे टूट चुके थे. तूफान खत्म हो चुका था. नाव किनारे पर आकर लग गयी थी- मल्लाह को चुपचाप रुपये देकर बिनती का हाथ थामकर... चन्दर ठोस धरती पर उतर पड़ा...मुर्दा चाँदनी में दोनों छायाएँ मिलती-जुलती हुई चल दीं. गंगा की लहरों में बहता हुआ राख का साँप टूट-फूटकर बिखर चुका था और और नदी फिर उसी तरह बहने लगी थी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो....

Tuesday, 16 June 2020

तनाव को दूर करने के 13 टिप्स

१. समय से सोए, समय से जगे, यदि आप वर्किंग प्रोफेशनल है तो 8 घंटे जरूर से अच्छी साउंड स्लीप ले ।।

२. मेडिटेशन जरूर करे, यदि आपको नींद नहीं आती है, स्लीपिंग डिस्टर्बेंस है तो जब आप बेड पर जाय, उससे पहले अच्छी तरह से हाथ मुंह धोए, पैरों को धोएं ।।

३. 5 मिनट भगवान का ध्यान करे, साथ ही कल की प्लानिंग जरूर करे, इससे आप कल को लेकर के फोकस्ड रहेंगे ।।

४  जब आप बेड पर सोने जाय, मेडिटेशन संगीत (music) जरूर लगाएं ,धीमी आवाज में इससे आप पाएंगे अलग ही दुनिया में धीरे धीरे आप जाएंगे साथ जल्दी और अच्छी नींद आएगी।।

५.सुबह या शाम जब भी आपको टाइम मिले आप २० मिनट थोड़ा वॉक जरूर करे।।

६.अपनी दैनिक क्रिया को अपनी डायरी में लिखने का प्रयास करे, यदि संभव हो तो डेली नहीं तो साप्ताहिक जरूर।।

७.कुछ दिन के लिए जहां आप रह रहे है, उस जगह से एक वीक का छुट्टी ले साथ ही किसी अच्छे जगह जाएं , जहां भी आपको पसंद हो ,घूम के आए, हो सकता है आपको पहाड़ , झड़ना , प्रकृति, समुन्द्र पसंद हो, जहां भी जाना पसंद थोड़ा टाइम अपने को दे, अपनों को दे , परिवार के साथ घूमने निकले।।

८. यदि आप किसी अवसाद से ग्रसित है तो मनोरोग चिकित्सक से जरूर मिले , और सिर्फ उन्हें फॉलो करे, इसका एक फायदा होगा क्यों की जो दवाइयां वो देंगे , वो केमिकल हमारे शरीर में मस्तिष्क में घुलेगा और धीरे धीरे हम अच्छा महसूस करेंगे कभी कभी ऐसा होता है जब हमारे मस्तिष्क में शरीर में किसी केमिकल का कम होना पाया जाता है या कम रिलीज होता है, उस वक़्त हमें मेडिकल साइंस के ऊपर भरोसा जरूर करना चाहिए साथ ही जो मैंने टिप्स दिए उसे भी फॉलो करें।

९  अपने परिवार वालों के संपर्क में जरूर रहे , बात करे, लोग कहते है आंसुओ में वजन काफी होता है, मन करे तो रोए, मन करे तो हंसे इससे आपके मन के अंदर के विकार बाहर आएंगे और आप अच्छा महसूस करेंगे।।

१०. मुस्कुराना सीखे , धीरे धीरे आपको इसकी आदत पड़ जाएगी, जो चीज़े आपकी जरूरत की ना हो उसे इग्नोर करे ।।

११. अपनी एक क्रमबद्ध तरीके से रूटीन बनाए, सुबह से शाम तक की और उसे अनुशासित ढंग से फॉलो करे, इससे आप का ध्यान भटकेगा नहीं।।

१२. सोशल मीडिया से कुछ समय के लिए दूर हो जाय और अपने आप को घूमने में, कुछ करने में व्यस्त रखे।।

१३. और अंत में अपने पर और जो आपके अपने है, उन पर विश्वास जरूर करे, इससे आप कॉन्फिडेंट रहेंगे ।।

Wednesday, 3 June 2020

एक आस ..।।

वो सुबह कभी तो आएगी, वो सुबह कभी तो आएगी,
जब हम बंद घरों से होंगे बाहर, वहीं चहल कदमी  फिर सुन आएगी।

फिर सभी स्वतंत्र हो घूमेंगे , ना कोई फिकर ना कोई चिंता होगी,
वो सुबह कभी तो आएगी, वो सुबह कभी तो आएगी।।

यूं तो इस कदर घरों में बैठना , अच्छा है प्रकृति के लिए ,
आवो हवा भी हो रही साफ , स्वच्छंद नदियों के लिए।

पर उनका क्या  ? जो हम पर ही निर्भर होते  रोजी रोटी के लिए,
हम यहां हो रहे खुश,और कहते -  चलो अच्छा है, अपनों के लिए।।

और "वो"  इसलिए चिंतित हैं, कि एक और दिन ना गुजर जाए भूख के मारे।
हां वो दिन ही तो गुज़ार रहे इस आश में की चल कर पहुंच पाए अपनों तक मारे - मारे।।

हां साब ।। जिस मजदूर ने इतने बड़े बड़े शहर बसा दिए , वो आज मजबूर हो गए,
हो गए वो "मजबूर" इस शहर को छोड़ने को, जिसे वो अपना मान बैठा था।

आज "हालात ए मजबूरी "ना होती तो यूं इस कदर यहां वहां ठोकरें ना खाते।
यूं ,इस कदर इनकी मौतें ना होती,उसी सड़क पर जिसे इसने खुद बनाया था।।

हे ईश्वर अब अपनी क्रोध की अग्नि को करो शांत, हम अबोध अब खड़े है सामने जोड़े दोनों  हाथ।।

एक आस के साथ ... कि वो सुबह जल्द ही आएगी , वो सुबह जल्द ही आएगी।।

धन्यवाद्,
आनंद

Sunday, 26 April 2020

कोरोना युग में बैंगलोर।।

यूं तो मै इतनी सुबह कभी उठता नहीं, चलो आज आप लोगो को इस कोरोना युग ( जी हां हम इसे कोरोना युग कह सकते है, ये एक ऐसी वैश्विक महामारी है जिसने विश्व के कई देशों को अपना शिकार बना लिया)
                 यूं तो बैंगलोर में कभी पहले ना हमने इतनी शुद्घ हवा में सांस ली और ना ही रातों के वक़्त कभी गगन में टिमटिमाते तारों को एक टक देखा , हां हमने यहां लगभग एक दशक अब पूरा कर लिया है, हमने बैंगलोर को इस कदर इंन एक दशक में बदलते देखा है ,मानो हम और हमारे जैसे व्यक्ति जो अपनी स्वार्थ वश इस शहर को नष्ट करने में अपना योगदान दिया हो।। बैंगलोर आज दूसरे महानगर की भांति अपने को उस गति से अग्रसित कर रहा है, चाहे बड़े बड़े अपार्टमेंट हो ( क्यों ना हम पेड़ पौधों को जंगलों को उपजाऊ जमीन को हटा कर बनाया हो) , सड़के, मार्केट, हर चीज यहां तीव्र गति से बढ़ी है।
       मुझे समझ नहीं आता इस कोरोना युग में प्रकृति का धन्यवाद करूं, या परम पिता परमेश्वर का शुक्रिया अदा करूं, जिन्होंने हम मानव को जब बनाया होगा ,उन्होंने भी कभी ऐसा सोचा ना होगा कि हम मानव अपनी स्वार्थ वश प्रकृति को नष्ट करने पर उतारू हो जाएंगे, कहीं ना कहीं ईश्वर जानते है, की उन्हे ये श्रृष्टि कैसे चलानी है, आज हम मानव पशु की भांति बंद कमरों में इस कदर बैठे है जैसा हमने कभी अपने पशु को अंदर जंजीरों में बांधा था, वहां हमने अपने पशुओं को अपने शौख के लिए बंद किया और यहां हम मौत के डर से अपने को घरों में बंद को मजबूर है।।
जब जब इस संसार में मानव अपने कर्मो की पराकाष्ठा को पार करके एक अलग दुनिया बसाने की कोशिश करेगा ,प्रकृति मानव को अपना शक्ति जरूर दिखाएगी, क्योकी प्रकृति से बलवान कोई भी नहीं।।
अब इस कोरोना युग में कुछ सकारात्मक पहलू की तरफ नजर दौड़ाते है,

हां हमें आज सुबह पक्षियों की कलरव करती आवाजे सुनाई दी , मानो एक स्वर में गाने की कोशिश कर रही हो,

हां हमने अपने व्यस्त समय में से अधिकाश अपने परिवार के साथ बिताया , मानों सब की आंखों में एक उम्मीद हो

हां हमने जीवन को एक सादगी के साथ जीना सीख लिया
मानो की इससे अच्छा समय कभी नहीं हो सकता

हां अब हम घरों में बंद है, नदिया स्वच्छ सी हो गई
हां होती भी क्यों ना अब प्रदूषण जो कम है।
हां अब पक्षिया एक स्वर में गा रही, तितलियां भी इतरा रही
हां गाए और इतराए भी क्यूं ना , अब हम जो बाहर ना है।।

अब इस कोरोना युग को क्या कहूं बस जो हो रहा है , प्रकृति की मंजूरी ही होगी।।





धन्यवाद्,
आनंद


Tuesday, 13 February 2018

"तुम्हारे साथ "

आज बहुत दिनों के बाद दिल किया कुछ लिखने कोयूँ तो प्यार की कोई भाषा नहीं होती है फिर भी इन्हे शब्दों का रूप देने की जुर्रत कर रहा हूँ...!! ये चंद पंक्तियाँ समर्पित है उस शख्श के लिये जो मेरी अर्धांगिनी है...!!


मेरी हर धड़कनों में तुम ही हो, जीवन की संगीत भी तो तुम ही हो ..
लड़ना -झगरना,  बातों-बातों में चुप हो जाना,पर इन सभी का हक़दार भी तो तुम ही हो ...!!
.


सुबह की पहली किरण देखना पसंद है, मुझे सिर्फ तुम्हारे साथ,
चाय की चुस्की के साथ "सुर्र -सुर्र "की आवाज़ करना पसंद है, मुझे सिर्फ तुम्हारे साथ...!!
अभी तो बहुत दूर तलक जाना है हमें सिर्फ तुम्हारे साथ,
अभी तो जिंदगी को और करीब से देखना है सिर्फ तुम्हारे साथ...!!
क्यों की ये साथ अच्छा लगता है "जान", सिर्फ तुम्हारे साथ,
किस तरह से अदा करूँ शुक्र तेरा, बस ये साथ हमेशा बना रहे सिर्फ "तुम्हारे" साथ,
लो आज हक़ से कहता हूँ, एक बार नहीं बार-बार है प्यार हमें सिर्फ तुम्हारे साथ ...!!


तुम्हारा,

आनंद 

Friday, 25 December 2015

अपनी पहली मुलाक़ात ..!!

वो हमारी पहली मुलाक़ात , हमें आज भी याद है,
तेरा वो बचपना , तेरा वो बात बात में डांटना ..!!
वो तेरा मेरे बगल में आके बैठ जाना फिर वो तेरा आहें भरना ..!
मेरे करीब आके फिर तेरा दूर जाना , मुझे छेड़ के बदमाशियां करना ..!!
वो तेरा अपने लबों को मेरे लबों के पास की शरारत ..!
फिर मेरे तेरे लबों को चूमने की वो नजाकत ....!!
वो मेरा तेरी गोद में सिर रख के तुझे घूरना ..!
फिर बार बार नजरे मिलाके नजरों को झुकाना....!!
फिर एक दूसरे को टकटकी लगाके देख के मुस्कुराना ..!
फिर एक दूसरे को बाँहों में लेकर लम्बी साँसे भरना ...!!.
एक दूसरे में इस कदर खो जाना की क्या कहेगा जमाना...!
मुझे अभी तक याद है वो हमारी पहली मुलाक़ात का छोटा सा नजराना...!!

आपका,
आनंद 


Sunday, 16 August 2015

एक सुखद यात्रा पूर्णिया से बैंगलोर तक की...!!

बात उन दिनों की है  जब हम छुट्टियों में अपने घर पूर्णिया आये हुए थे , छुट्टियां ख़त्म हुई और हम घर से वापस बैंगलोर को रहे थे..मार्च का महीना था ..थोड़ी गर्मी पड़ने को थी, पसीने में लथ-पथ थे..गाडी अपने समय से पहले स्टेशन पहुंच चुकी थी ..हम अपने पापा के साथ थे जो हमें छोड़ने को स्टेशन तक आये हुए थे,,.कुछ देर पापा हमारे साथ हमारी बगल वाली सीट पर बैठे , फिर गाडी ने हॉर्न (सिटी ) दी ..उसके बाद मैंने पापा को प्रणाम किया और उनसे इज़ाज़त मांगी की जल्द ही फिर वापस आऊंगा इस बार और थोड़े दिन हाथ में रखूँगा

इतने
में एक लड़की यही कोई २३-२४ साल उमर रही होगी हांफती हुई ..अपने दुप्पटे से चेहरे को पोछती हुई  हमारे कोच के दरवाजे के पास खड़ी थी शायद उसे भी उसी ट्रैन से सफर करना था..पर वो सामान लेकर दरवाजे पे क्यों खड़ी थी ये मेरी समझ से परे था ..कुछ देर रुक कर जो मन के अंदर सवाल उठ रहे थे हमने आखिर पूछ ही लिया  आप यहाँ क्यों खड़े हो? कुछ देर में गाडी रवाना हो जाएगी जल्दी से ऊपर आ जाओ ,,फिर वो बोली : मै अपने भाई और माँ का इंतज़ार कर रही हू जो के साथ में आये हैं.मैं थोड़ी आगे आ गयी और ये भी डर था की ट्रैन निकल न जाय  .एक बैग उनके साथ है..कुछ देर बाद उनके भाई और उनकी माँ आयी और उन्हें दूसरा बैग थमा कर उसे विदा करी ( अमूमन ये हमारे संस्कार में है की विदा लेते समय हम अपने बड़ो को प्रणाम और छोटे को गले से लगाते हैं और नम आखों से अगली बार का भरोसा दिलाते हैं )  फिर कुछ देर में वो ट्रैन में चढ़ी जो बस प्लेटफॉर्म से चलने को ही थी ।। हम अपने शहर को अपनी भीगी आखों से ये कहने की कोशिश कर रहे थे अपनों को विदा करना , अपनों से दूर सिर्फ रोजी रोटी के लिए जाना कितना कष्टकारी होता है) संजोग से उसकी सीट मेरे ही बगल में थी ( लो भैया अब सुनिए आगे )... सन्नाटा सा पसरा था।  ..क्यों की कम्पार्टमेंट में जो की ८ सीट्स थी उसमे सिर्फ एक लड़की..शायद वो लड़की भी यही सोच रही थी कहा आकर फस गयी,,चुपके से फ़ोन निकाली अपनी बैग से और  अपने दोस्त को मैसेज में बता रही थी ( ऐसा मै सोच रहा था )..इट्स बोरिंग यार. ऑल आर गाइस ओनली...हाहा....!!





फिर कुछ देर बाद टीटी महोदय आए .एकदम्मे धुत्त काले कोट धारण किये और दिए लम्बा लबा बखान अपने एकदम सुच्चा बिहारी स्टाइल में  हमारे टाइम ऐसा और आज के टाइम में ऐसा, मानो उनकी वाणी को विराम देने को सोच सभी लोग रहे थे , किन्तु ८ लोग में कोई नहीं था जो उनके ऊपर चुटकी ले सके, फिर मुझसे रहा ना गया, चुटकी लेना कहां क्या बोलना ये तो अपनी प्रकृति रही है,,सो हमने चुटकी ली और सभी हंस पड़े ( कुछ इस अंदाज़ में अरे कहाँ सर... का बात कर रहे है हमरे यहाँ तो ऐसा होता है )..फिर धीरे धीरे सभी लोग एक दूसरे से जान पहचान बढ़ाने कि कोशिश करने लगे ( ये हमारे यहाँ का स्वभाव है यदि हमलोग कही यात्रा करते है तो आस पास कौन बैठा है कौन कहा जा रहा है जरूर पूछते है इससे अपनापन बढ़ जाता है )..फिर शीत वाक्य युध्ह छिड़ा पूर्णिया और कटिहार के बीच कौन बेहतर किस दृष्टिकोण से ( एकदम अखाडा के माफिक ), हम पूर्णिया वाले चाहे कैसे भी हो जब बात हमारी शहर की होती है XYZ कुछ भी प्रूफ करके अपने जगह को आगे कर ही देते हैं ( ऐसे ये तो हुई मज़ाक की बात हमारा पूर्णिया २५० साल लगभग पुराना है और इसका इतिहास बस आप इस अंदाज़ में लगा सकते है जहां के फणीश्वर नाथ रेणु जी थे जिनकी मैला आँचल उपन्यास पर "तीसरी कसम" सिनेमा बनी) हुआ भी यो ही,,फाइनली जहां के भी लोग थे पूर्णिया को श्रेष्ठ मानने में कतराएं नहीं,.. हमारे बीच एक अनोखे भाई साब थे जो की एयरफोर्स में कार्यरत थे , बेचारे बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन का एग्जाम देने आये थे ..चार दिनों से सिर्फ ट्रैन से ही यात्रा कर रहे थे क्यों की लगातार २ एग्जाम और आना जाना अनवरत ( ये कोई हमारे फौजी भाई ही कर सकते है उस पर से जो बिहार से हो जब तक अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाय तब तक संघर्ष एकदम मांझी टाइप "जब तक तोड़ेंगे नहीं तब तक छोड़ेंगे नहीं " ) ..हम रख दिए उनका नाम "कलाकार" ..स्वाभाव के बड़े ही नम्र व्यक्ति.थे .हम लोग चाहे कुछ भी बोल देते पर उनको तनिक भी बुरा नहीं लगता था,,,।। एक भाई जी और थे बगल वाली सीट पर जिनका नाम ध्यान में तो नहीं है.पर इतना याद है उनको भुवनेश्वर उतारना था..उनसे थोड़ी बात हुई थी वो केरल के किसी बीच का जिक्र कर रहे थे, साथ ही थोड़ा टाइम जब भी मिलता था उन्हें तो वो बस बोल पड़ते थे... यहाँ ये यहाँ वो और उसे साबित करने के लिए तो ये देख लो टाइप करके मोबाइल झट से आगे बढ़ा देते थे  ,,आई - फोन जो रखे हुए थे ...जरा सी कुछ बात बात पर गूगल सर्च फट से अपना फ़ोन निकाले और सर्च करना चालू..खैर इसी के साथ यात्रा का पहला दिन समाप्त हुआ किसी तरह ,,!!


 

दूसरा दिन..

सुबह होते ही भुवनेश्वर वाले भाई साब उतर गए.अपने स्टेशन आने पर।। .चुकी यात्रा लम्बी थी तो हमने सोचा यदि थोड़ी चहल -पहल ना हो तो सफर बोझिल हो जायेगा ( ये एक फायदा होता है जब आप फ्लाइट से न जाकर ट्रैन से यात्रा करते है फ्लाइट में एक तो यात्रा का समय काफी छोटा होता है और लोग भी काफी मतलबी , किन्तु ट्रैन का सफर यदि अच्छे लोग मिल जाय तो एक रिश्ता सा बन जाता है )..अब बात करते है दूसरे दिन की ..एक शांत सा लड़का जो कटिहार से ही चढ़ा था ट्रैन में ..बोला हम भैया बैंगलोर से ही इंजीनियरिंग किये अभी कुछ दिन पहले जॉब लगी है पुणे शिफ्ट हो जायेंगे ( तो यूँ हमलोग पहले बातें शुरू किए)..यात्रा लम्बा है कैसे कटेगा..कार्ड(ताश की पत्ती) है हमारे पास यदि आपलोग साथ दीजिये तो समय निकल जायेगा..सभी तैयार हुए .एक लोग बच रहे थे ( यूँ तो कम्पार्टमेंट में ८ लोग थे पर कुछ मोबाइल में तो कोई अपने उसके साथ बिजी थे ) , सभी ने मिलकर उस लड़की को कार्ड खेलने के लिए कहा  ..तो लड़की बोली मुझे तो खेलना भी नहीं आता है .(खैर हमें कौन सा आता था..) फिर हमलोगो के बीच हसी ठहाकों के बीच यात्रा जो के उबाऊ हो रहा था कुछ देर में मजेदार हो गया सभी मिलकर यु चादर बिछाये और दे ताश की पत्ती ये रहा गुलाम , जोकर, बादशाह , टिकरी , पान इसके साथ ही खेल शुरू।। ..मानो ऐसा लग ही नहीं रहा था की हम लोग एक दूसरे को नहीं जानते थे..दिन तो किसी तरह बीत गया..भूख बढ़ रही थी शाम होने को थी .सबने फैसला किया की हमलोग विजयवाड़ा में ही खाएंगे ( बड़ा ही चर्चा सुना था वहां के बिरयानी का पर कभी हिम्मत ना हुई यात्रा के दौरान ट्रैन से उतर कर खाना ला सके )..शाम होने को थी लगभग ठीक ७ बजे जो लड़की हमलोग के साथ बैठ के खेल रही थी उसने अपना लैपटॉप लिया दूसरी सीट में जाकर बैठ गयी..(भगवान जाने क्या कर रही थी, शायद उसे कार्ड के गेम में इंटरेस्ट नहीं था..तो मूवी लगा के बैठी होगी )..मैने चुपके से उसे देखा तो वो बालों को सवार रही थी ..कुछ देर बाद फिर वापस उसी सीट पे आकर बैठ गयी..कुछ ही देर में विजयवाड़ा स्टेशन आने वाली थी..मै और एक भाई साब जो BHEL में कार्यरत थे दोनों ने जिम्मा लिया सबके लिए यहाँ से बिरयानी लाएंगे,,मैंने सब को बोला भाई सब थोड़े थोड़े पैसे दो और फिर कॉन्ट्री के पैसे लिए सबसे..फिर दोनों लोग चल पड़े बिरयानी की पैकिंग करवाने प्लेटफार्म नंबर ७ से ..साथ में हमने ये भी कहा ..यदि गाड़ी निकलने लगी चैन खीच देना .सब मिलके पैसे भर देंगे..हम बाहर निकले और सब लोगो के लिए मस्त सा डिनर का इंतज़ाम किये..बिरयानी, कवाब, कोल्ड ड्रिंक ..फिर सब अनजाने से लोगो की एक फैमिली सी बन गयी.सबने मिलके डिनर किया..और सब लोगो के लिए हमने मॉकटेल बनाया ..३-४ कोल्ड ड्रिंक को एक साथ मिलाकर..सब मस्त खाए पिए., हंसी ठठोली हुई .और सब अपनी अपनी सीट पर सोने चले गए..बहोत देर तक हमें नींद आई नहीं..फिर .हमने हेड फ़ोन लगाया..गानो के साथ हम भी सो गए.और पलक झपकते ही    सुबह हो गयी।। .


तीसरा दिन

ये हमारी यात्रा की आखिरी दिन थी..अब हम सुबह ठीक ९ बजे बैंगलोर पहुंचने वाले थे..सब यही टेंशन में थे आज ऑफिस जाना ..है कैसे कैब को बुलाया जाए,कोई रिलेटिव को फ़ोन किए जा रहा था..कोई यात्रा अच्छी होने की खबर सुना रहा था..सब लोग एक दूसरे को धन्यवाद बोल रहे थे..इसी बीच वो लड़की थोड़ी हिम्मत जुटा कर मेरे से पूछती है..भैया,.ये पता बताएँगे,,? ये भी शायद आप जहां रहते हो वही आस पास है..मैंने पता देखा और मुस्कुराया बोला हां मुझे पता तो है ..लेकिन मुझे भी बहुत ज्यादा आईडिया नहीं है...लेकिन फिर भी मैं आपकी मदत कर दूंगा ..फिर मैं चुप हो गया..हमलोगो में से अधिकतर लोग कृष्णराजपुरम ( बैंगलोर का एक स्टेशन ) में उतरने वाले थे..जैसे ही हमने बैग पैक किया और जाने लगे.उस गुमनाम लड़की ने हिम्मत करते हुए.हमसे कहा.यदि आप बुरा ना माने तो आप अपना नंबर हमें दे सकते हैं..? हमने बोला ठीक है..फिर नंबर दिया हमने..और हमलोग उतर गए,,उस लड़की को यशवंतपुर तक जाना था..उतरने के साथ सबको अलविदा कहा..इस तरह से ये यात्रा एक यादगार लम्हा बन गई..आज की तारीख में वो लड़की मेरी सबसे अच्छी दोस्त है....!!


धन्यवाद,
आनंद

Thursday, 28 May 2015

एक अंतिम पत्र आपके नाम....!!

तुझे खुद से ज्यादा सम्मान दिया मैंने,
तुझे खुद से ज्यादा चाहा था मैंने,,
तेरी हर बातों को सर आँखों पे लिया था मैंने,
तेरी हर एक चीज़ को प्राथमिकता दी थी मैंने..

भूल जाऊं जो नाम एक पल के लिए तुम्हारा न होगा..
तुम भी कही अपनी दुनिया बसाओगे फिर से 
पर हमारे बिना तुम्हारा भी गुज़ारा ना होगा..
तेरी आँखों से भी फिर से बरसातें ही होंगी,
जो तेरी आँखों के आगे ये नज़ारा ना होगा,

तेरे कानो में गुन्जेंगे ये अल्फाज़ मेरे,
इतनी आवाज़ देंगे जितना किसी ने तुझे पुकारा ना होगा.
दिल के ज़ज्बातों को कागज़ पर उड़ेलोगे तुम भी,
कांपेगी उंगलियाँ और कोई सहारा ना होगा,
जब भी मिलेगा कोई ख़त तुझे गुमनामियों मे,
ख्याल आएगा मेरा पर वो ख़त हमारा ना होगा.

                                                    धन्यवाद, 
                                                      आनंद 

Monday, 2 February 2015

हमारे रिश्ते का नाम क्या है ?

आज चलो हम अपने रिश्ते के बारे में पूछते हैं ..खुद से ..!!
कभी सोचा है तुमने, हमारे रिश्ते का नाम क्या है ?
मोहब्बत,ज़रूरत, ख्वाहिश, जुनून, इश्क़ .या....
वो रिश्ता जो,आसमान का ज़मीन से है
बारिश का सेहरा से है
हक़ीकत का खवाबों से है
दिन का रात से है
ये भी कभी एक दूसरे से मिल नही सकते
लेकिन एक दूसरे के बगैर अधूरे भी हैं
शायद ऐसा ही कुछ रिश्ता
मेरा और तुम्हारा भी है...

आपका,
आनंद 

Thursday, 29 January 2015

कितना है मुझ से प्यार लिख दो....!!

कितना है मुझ से प्यार लिख दो....
कटती नहीं ये ज़िन्दगी अब तेरे बिन,
कितना और करूँ इंतज़ार लिख दो.
तरसते रहे हैं बड़ी मुद्दत से,
इस बार अपनी मुहब्बत का इज़हार लिख दो.
दीवाने हो जाएँ जिसे पढ़ के हम,
कुछ ऐसा तुम मेरे यार लिख दो.
ज्यादा नहीं लिख सकते तो मत लिखो तुम,
मुहब्बत भरे लफ्ज़ दो चार लिख दो.
एक बार लिखो मुहब्बत है तुम्हे मुझ से,
फिर यही जुमला बार बार लिख दो....

आपका,
आनंद

Sunday, 7 December 2014

दिल की बात दिल तक

जिंदगी ना जाने किस मोड़ पे ला के खड़ी कर दी है। 
एक वो है जिसके लिए हर वक़्त दुआ करता हूँ 
जब भी दर पे उनके आगे खड़ा होकर कुछ मांगने की इक्षा रखता हूँ। 
तो भी सिर्फ उनका ही चेहरा नजर आता है। 
उनकी तरक्की जीवन का हर सुख उन्हें मिले 
जिनकी आश वो लगा के बैठी हैं.. 
क्या किसी को सच्चे मन से निःस्वार्थ भावना से चाहना गलत है। 
"कोई तो बात है जिस पर ख़फ़ा है मुझसे वो , राब्ता रखता है अब वास्ता नहीं रखता...!
फिर भी हृदय में उनकी ही मूरत होगी. और न जाने किस दिन वो  समझने का पर्यत्न करेगी। 
ऐसा न हो समझने की धुन में वो नादान कभी हमें समझ न पाये। 



आपका,
आनंद