‘अक्टूबर जंक्शन’ पढ़ने के बाद दिव्य प्रकाश दुबे जी की लेखनी ने मन पर जो असर छोड़ा था, उसी ने मुझे उनकी अगली चर्चित कृति मुसाफिर कैफ़े तक पहुँचा दिया। ऊपर से आने वाली सीरीज़ में विक्रांत मेसी जैसे सुलझे हुए कलाकार का नाम जुड़ जाए, तो उत्सुकता और भी बढ़ जाती है। सोचा, क्यों न पहले किताब को ही अपने तरीके से महसूस किया जाए — क्योंकि समीक्षा आखिरकार निजी होती है। जो मैंने देखा-समझा, जरूरी नहीं आप भी वैसा ही देखें… पर शायद कुछ एहसास मिल जाएँ।
कहानी आखिर है क्या?
‘मुसाफिर कैफ़े’ सपनों, प्रेम और उन अधूरे ख्वाबों की कहानी है जो हमारी “लिस्ट” में तो होते हैं, पर ज़िंदगी उन्हें अपनी शर्तों पर पूरा करती है।
मुख्यतः यह कहानी है सुधा और चंदर की — दो बिल्कुल अलग स्वभाव के लोगों की।
एक मुलाकात… एक कैफ़े… और दो जिंदगियाँ जो अनजाने में एक-दूसरे की ओर बढ़ने लगती हैं।
सुधा, जो पेशे से तलाक वकील है, शादी पर विश्वास नहीं करती। उसने रिश्तों को टूटते देखा है, इसलिए वह बंधन से डरती है।
चंदर, एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, सीधा-सादा और समझदार — जो उसकी सोच को सुनता भी है और समझता भी।
धीरे-धीरे बातों से साथ, और साथ से अपनापन जन्म लेता है।
वे साथ रहने लगते हैं… प्यार भी होने लगता है…
पर प्रेम हमेशा सीधा रास्ता नहीं चुनता।
ज़िद, सपने और अपनी-अपनी सोच — इन सबके बीच उनके रास्ते अलग हो जाते हैं।
और फिर वही प्रश्न ? —
क्या दो लोग जो एक-दूसरे को सबसे बेहतर समझते हैं, सच में अलग रह सकते हैं?
या जिंदगी उन्हें फिर किसी मोड़ पर मिलाती है?
किताब पढ़ते हुए कई जगह मुझे गुनाहों का देवता की याद आई। कहानी अलग है, पर रिश्तों की गहराई और अनकहे भावों का असर कहीं-कहीं वैसा ही लगता है।
दिव्य प्रकाश जी की खासियत उनकी सहज भाषा है — बोलचाल की, हल्की-फुल्की, मगर भीतर से गहरी।
वे भारी शब्दों का सहारा नहीं लेते, बल्कि साधारण पंक्तियों में असाधारण बातें कह जाते हैं —
“लाइफ को लेके प्लान बड़े नहीं, सिंपल होने चाहिए…”
“सबसे ज्यादा वो यादें याद आती हैं जो हम बना सकते थे…”
कहानी सिर्फ प्रेम नहीं कहती, यह हमें यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि —
क्या हम अपने सपनों के लिए जीते हैं, या सपने हमारे लिए?
क्या हर रिश्ता नाम का मोहताज होता है?
हाँ, कहीं-कहीं लगा कि भाषा थोड़ी और गहरी होती तो कुछ भाव और गहरे उतरते।
लेकिन फिर यही सादगी शायद इस कहानी की असली ताकत भी है।
कहानी का अंत अप्रत्याशित है — और यही उसे यादगार बनाता है।
सुधा और चंदर कहीं न कहीं हमारे भीतर ही बस जाते हैं — हमारे अधूरे फैसलों में, हमारी टलती हुई हिम्मत में, और उन सपनों में जिन्हें हम कल पर छोड़ देते हैं।
शायद इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात यही है कि यह हमें अपने दिल की “लिस्ट” याद दिलाती है — वो लोग, वो ख्वाब, वो बातें जिन्हें हम जी तो सकते थे, पर जी नहीं पाए।
और फिर मन ही मन एक सवाल छोड़ जाती है —
क्या अभी भी देर हुई है, या हम अपने हिस्से का सफर शुरू कर सकते हैं? 💛









