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अक्टूबर जंक्शन - दिव्य प्रकाश दुबे

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मैं एक इंजीनियरिंग का छात्र रहा हूँ, लेकिन साहित्य से मेरा रिश्ता बहुत पुराना और आत्मीय रहा है। जब भी ज़िंदगी की भागदौड़ में खुद से दूर होता जाता हूँ ,तो मैं इस पुराने दोस्त—किताबों—को गले लगा लेता हूँ। जब मन बोझिल हो, जब समझ न आए कि क्या करूँ, तब एक अच्छी किताब मेरे लिए सहारा बन जाती है। शब्दों के साथ बिताया गया वह समय सिर्फ़ मन बहलाता ही नहीं, बल्कि भीतर कहीं गहराई में ठहराव भी पैदा करता है। साहित्य से दोस्ती करने का यही तो जादू है—यह आपको रुकना सिखाता है, साँस लेने की मोहलत देता है, और उस शांति से मिलवाता है जिसे हम अक्सर इस तेज़ रफ़्तार दुनिया में नज़रअंदाज़ करते चले जाते हैं। इसी प्रेम और अपनापन के साथ मैं अक्टूबर जंक्शन को पढ़ने बैठा, और शायद यही वजह है कि यह कहानी मुझे सिर्फ़ पढ़ी हुई नहीं लगी, बल्कि महसूस की हुई लगी… "अक्टूबर जंक्शन " चित्रा पाठक और सुदीप यादव की एक बेहद ख़ूबसूरत कहानी है। दोनों की पहली मुलाक़ात 10 अक्टूबर को बनारस के एक छोटे-से कैफ़े में होती है—जहाँ किताबों की खुशबू और बातों की गर्माहट धीरे-धीरे दो अनजानी ज़िंदगियों को जोड़ देती है। पढ़ने का शौक द...