तुम्हारे शहर का नाम अब भी मेरी धड़कनों में दर्ज है, उसका हर रास्ता, हर मोड़, हर शाम मुझे अब भी याद है।
पर शायद मैं वहाँ अब कभी नहीं आऊँगा…
क्योंकि उसी शहर ने मेरे वहाँ आने की वजह मुझसे छीन ली है, कितने अजीब होते हैं ये शहर भी।
पहले किसी अजनबी को हमारी पूरी दुनिया बना देते हैं। उसकी मुस्कान में हमारी सुबहें सजा देते हैं,
और उसकी बातों में हमारी शामें।
फिर एक दिन…..
उसी भीड़ में उसे हमसे ऐसे छुपा लेते हैं जैसे वह कभी हमारा था ही नहीं।
कुछ शहर दिल में घर बना लेते हैं,
पर उनकी गलियों में लौटना मुमकिन नहीं होता।
तुम्हारा शहर भी कुछ ऐसा ही निकला, उसी ने मुझे तुमसे मिलाया था, उसी ने तुम्हारी हँसी से मेरे दिनों को महकाया था और फिर उसी ने एक दिन बिना कोई शोर किए तुम्हें मुझसे दूर कर दिया।
मुझे कहानियाँ पढ़ने और लिखने का शौक बचपन से था, किताबों में लिखी कहानियाँ हमेशा अच्छी लगती थीं।
पर मैंने कभी सोचा नहीं था कि एक दिन हम ख़ुद ही एक कहानी बन जाएँगे और वो भी ऐसी कहानी—
जिसका आख़िरी पन्ना कभी लिखा ही नहीं गया।
कुछ कहानियाँ पूरी नहीं होतीं,
बस याद बनकर उम्र भर साथ चलती हैं।
पहले तुम रोज़ मिला करती थी, हमारे बीच बातों के दरिया बहते थे ..हर छोटी-सी बात में भी एक अपनापन था,
हर मुलाक़ात में एक सुकून और अब…हफ़्तों बीत जाते हैं तुम्हें देखे बिना, तुम्हारी आवाज़ सुने बिना।
शायद आने वाले वक़्त में हम कभी मिलें भी नहीं, शायद तुम मेरे होने का एहसास भी भूल जाओ।
पर मैं… मैं तुम्हें कैसे भूलूँ? तुम मेरी आदत नहीं थी,..तुम मेरी दुआ थी।
जिसे दिल दुआ बनाकर माँगता है,
उसे भूलना आसान नहीं होता।
कभी-कभी सोचता हूँ—
कुछ सालों बाद जब तुम्हारी तस्वीर मेरे दिल में थोड़ी धुँधली पड़ जाएगी, जब तुम्हारी यादें भी मुझे थोड़ा कम सताएँगी, जब तुम अपनी दुनिया में बहुत मशरूफ़ हो जाओगी… और शायद मुझे पूरी तरह भूल जाओगी— तब मैं तुम्हारे नाम एक ख़त लिखूँगा, उस ख़त में लिखूँगा—
“तुम्हारी याद में यूँ ही तड़प-तड़प कर मर जाएँगे एक दिन,
तुम तारों से बैठकर करोगी फिर बातें मेरी।”
फिर उस ख़त को एक गुमनाम पते पर भेज दूँगा— जो शायद कभी तुम तक पहुँचे ही नहीं, पर उस दिन…
मैं ख़ुद को रिहा कर दूँगा, तुम्हारी यादों की कैद से,.तुम्हारी झूठी क़समों से,.उन अधूरे वादों से जो आज भी मेरी रातों को जगाए रखते हैं, और फिर निकल पड़ूँगा एक नए सफ़र पर अकेला… पर थोड़ा मज़बूत और खुद से एक वादा करूँगा—
अब कभी तुम्हारे शहर नहीं आऊँगा।
क्योंकि सच यही है—
कुछ शहर सिर्फ़ यादों में अच्छे लगते हैं, हक़ीक़त में नहीं।

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