कभी-कभी मुझे लगता है कि समस्या ज़िंदगी में नहीं है। समस्या हमारे भीतर की उस बेचैनी में है, जो हर चीज़ को किसी परिभाषा में बाँध देना चाहती है। हमें बचपन से सिखा दिया जाता है कि जीवन एक सीधी रेखा है। इतनी उम्र में पढ़ाई पूरी कर लो, इतने साल में सफलता पा लो,
यह सही है, वह गलत है। जैसे ज़िंदगी कोई गणित का प्रश्न हो, जिसका एक ही उत्तर सही माना जाएगा।
पर सच कहूँ…ज़िंदगी कभी भी ब्लैकबोर्ड पर लिखी जाने वाली कोई समीकरण नहीं रही। वह तो एक नदी की तरह है— कभी शांत, कभी उफनती, कभी रास्ता बदलती हुई, कभी चट्टानों से टकराकर अपना नया रास्ता खुद बनाती हुई। ज़िंदगी को समझना आसान होता
ज़िंदगी को समझना आसान होता
अगर वह सवाल होती।
पर वह तो कहानी है,
जो हर मोड़ पर नया अध्याय लिखती है।
हम पैमाने इसलिए बनाते हैं क्योंकि हमें अनिश्चितता से डर लगता है। हमें लगता है कि अगर नियम बना लिये, अगर सही और गलत की रेखाएँ खींच दीं, तो शायद हम सुरक्षित रहेंगे। पर जीवन की सबसे बड़ी सुंदरता ही यही है कि वह तय नहीं है, अगर सब पहले से तय होता तो आश्चर्य कहाँ से आता? सीख कहाँ से आती? और अनुभव की गहराई कहाँ से जन्म लेती? अगर रास्ते पहले से लिखे होते, तो सफ़र का मतलब ही क्या होता जो अनजान मोड़ नहीं आते, तो कहानी का जादू कहाँ होता।
शायद इसी वजह से ज़िंदगी जीने का तरीका भी कोई स्थिर सूत्र नहीं हो सकता। वह हर दिन बदलता है—परिस्थितियों के साथ, अनुभवों के साथ, और हमारे भीतर जागती हुई समझ के साथ। आज जो सही लगे, कल बदल भी सकता है और इसमें कोई अपराध नहीं है। क्योंकि परिपक्वता शायद यही है— कि हम यह स्वीकार कर लें कि हमें हर मोड़ का पता नहीं है, फिर भी हम चलने का साहस रखते हैं। सफ़र का भरोसा रास्तों पर नहीं, चलने वाले के हौसले पर होता है। मंज़िल कभी तय नहीं होती, बस चलना ही कहानी बन जाता है।
शायद जीने का तरीका तय करने से ज़्यादा ज़रूरी है ,जीने के सच को स्वीकार करना कि जीवन अनिश्चित है. कि वह अपूर्ण है और शायद इसी अपूर्णता में उसकी सबसे बड़ी पूर्णता छिपी है तय अगर कुछ होना चाहिए तो बस इतना— कि हम अपने भीतर की ईमानदारी न खोएँ। बाकी रास्ते… वे चलते-चलते खुद बनते जाते हैं।
रास्ते हमसे नहीं पूछते,
हम ही उनसे गुज़रते जाते हैं।
और एक दिन मुड़कर देखते हैं—
तो पाते हैं,
रास्ते नहीं…
ज़िंदगी बन गई है।

No comments:
Post a Comment