इंजीनियरिंग का छात्र होने के वाबजूद हमें साहित्य से बहुत लगाव है, कई वर्षों के बाद फिर से किताब उठाई है , अपने इस साहित्यिक दोस्त से फिर से दोस्ती कर ली है हमने , कहते है जब आप साहित्य पढ़ते है तो "आप" आप नहीं रह जाते , हर किसी को अपने जीवन में साहित्य को शामिल जरूर करना चाहिए।
इस बार जो किताब हमने शुरू करी वो थी धर्मवीर भारती जी की " गुनाहों का देवता " ये धर्मवीर जी की कालजयी रचना है , ओह मुझे नहीं पता इसे मैने खत्म किया ये किताब ने मुझे खत्म, पद्मश्री से सम्मानित धर्मवीर जी ने ये किताब महज २३ साल की उम्र में लिखा था ,लेखकों ने कहा कमजोर कृति है और आज सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले उपन्यासों में एक है ये , प्यार ,समर्पण, त्याग का अनूठा उदाहरण चन्दर और सुधा की कहानी ।
कहानी के चार मुख्य किरदार हैं. हीरो चन्दर, प्रेमिका सुधा, और चंदर की दो और दीवानी बिनती और पम्मी. गुनाहों का देवता की पूरी कहानी इन्हीं किरदारों के इर्दगिर्द घूमती है. चन्दर यानी इस प्रेम कहानी का हीरो सुधा के प्रोफेसर पिता के प्रिय छात्रों में से एक है
कहानी काफी साधारण हैं । चन्दर एक गरीब परिवार से हैं और डॉ. शुक्ला उसे अपना लेते हैं। शुक्ला जी की लड़की हैं सुधा। चन्दर का शुक्ला जी के घर बे रोक टोक आना जाना रहता हैं। सुधा और उसके बीच काफी हसी ढिंढोली चलती रहती हैं। चन्दर अपनी रिसर्च मैं व्यस्त रहता हैं और बीच बीच मै डॉ. शुक्ला के संग उनके कार्यक्रम मैं जाता हैं। शुक्ला जी ने चन्दर का करियर बनाने का जिम्मा अपने सिर पर ले लिया था और उसका मार्ग दरशन करते रहते थे। सुधा शादी से हमेशा इंकार करती है क्यूंकि उसे चन्दर से प्यार हैं लेकिन चन्दर जिस आदमी के आश्रय तले पढ़ा, उसको कैसे धोखा देता
जो चन्दर सुधा को मन ही मन इतना चाहता था, वही किसी दुसरे से उसका रिश्ता तय करवाने चला।
सुधा की शादी संपन्न हो जाती है लेकिन सुख कभी नहीं आता।
चंदर, सुधा से प्रेम करता है, लेकिन सुधा के पिता के उस पर किए गए एहसान और उसके आदर्शों के कारण वह अपने मन की बात सुधा से नहीं कह पाता. , चंदर, सुधा के लिए अपने प्रेम को दबाकर रखता है और अपने आदर्शों को महत्व देता है, जो उसे "गुनाहों का देवता" बनाता है.
गुनाहों का देवता का अर्थ मेरी नजर में -अपने आत्मसम्मान की चिंता वो लोग कतई नहीं करते जो सदैव ये चाहते है मुझसे किसी को ठेस न पहुंचे और दूसरों का कल्याण होता रहे ।
सभी अच्छी कहानियो का अंत प्रायः दुखद ही होता है और जब कहानी प्रेम पे आधारित हो तो दुखद अंत तो और आवश्यक हो जाता है। गुनाहो का देवता मै भी कुछ ऐसा ही हैं। अब जिंदगी मै कभी कभार ही प्रेम प्रसंग अपने मुकाम मै पहुंच पाते हैं, ज्यादातर विफल हो जाते हैं और विफलता के प्रसंग ही पढ़ने लायक, बांटने लायक होते है। जब सब कुछ अच्छा हो जाये तो फिर पढ़ने मैं काहे का आनंद? शायद इसी दुविधावश लेखक को इस कहानी को दुखद अंत देना पड़ा।
भले ही कहानी मैं उन सब बातो का जिक्र है जो साधारणतया हम हिंदी साहित्य मैं पाते नहीं, लेकिन उस समय के समाज का आयना हैं गुनाहो का देवता।
कहानी का अंत मन को काफी झुंझला देता हैं। हम पढ़ना चाहते हैं उन रचनाओं को जिनका अंत आशा के विपरीत हो, चाहते हैं की लेखक हमे चकित करें लेकिन मन में फिर भी कहीं एक आशा की आशा की किरण होती हैं की शायद अंत अच्छा हो। खैर, अंत कैसा भी क्यों न हो, सबको पसंद आ नहीं सकता लेकिन इस कहानी का अंत कुछ ज्यादा ही दुखद हैं।
गुनाहों के देवता की कुछ ऐसी पंक्तियां जो सोचने पर मजबूर करती है कुछ तो ऐसी है जो अंदर तक झकझोड़ देती है..
" या तो प्यार आदमी को बादलों की ऊँचाई तक उठा ले जाता है , या स्वर्ग से पाताल में फेंक देता है।लेकिन कुछ प्राणी हैं, जो न स्वर्ग के हैं न नरक के, वे दोनों लोकों के बीच में अंधकार की परतों में भटकते रहते हैं। वे किसी को प्यार नहीं करते, छायाओं को पकड़ने का प्रयास करते हैं, या शायद प्यार करते हैं या निरंतर नयी अनुभूतियों के पीछे दीवाने रहते हैं और प्यार बिलकुल करते ही नहीं। "
"हरेक आदमी जिंदगी से समझौता कर लेता है किन्तु मैंने जिंदगी से समर्पण कराकर उसके हथियार रख लिए हैं "
“विश्वास करो मुझ पर सुधा, जीवन में अलगाव, दूरी, दुख और पीड़ा आदमी को महान बना सकती है। भावुकता और सुख हमें ऊँचे नहीं उठाते।”
"क्या पुरुष और नारी के सम्बन्ध का एक ही रास्ता है -प्रणय, विवाह और तृप्ति ! पवित्रता, त्याग और दूरी क्या सम्बन्धों को, विश्वासों को जिन्दा नहीं रहने दे सकते?"
आओ चन्दर "आज अपने हाथ से खिला दूं, कल ये हाथ पराये हो जाएंगे”
“लेकिन आदमी हँसता है, दुख-दर्द सभी में आदमी हँसता हैं। जैसे हँसते-हँसते आदमी की प्रसन्नाता थक जाती है वैसे ही कभी-कभी रोते-रोते आदमी की उदासी थक जाती है और आदमी करवट बदलता है। ताकि हँसी की छाँह में कुछ विश्राम कर फिर वह आँशुओं की कड़ी धूप में चल सके।”
उपन्यास की आखिरी लाइनें हैं... "सितारे टूट चुके थे. तूफान खत्म हो चुका था. नाव किनारे पर आकर लग गयी थी- मल्लाह को चुपचाप रुपये देकर बिनती का हाथ थामकर... चन्दर ठोस धरती पर उतर पड़ा...मुर्दा चाँदनी में दोनों छायाएँ मिलती-जुलती हुई चल दीं. गंगा की लहरों में बहता हुआ राख का साँप टूट-फूटकर बिखर चुका था और और नदी फिर उसी तरह बहने लगी थी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो....